औरत हो, गाय नहीं..!
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औरत हो, गाय नहीं..!


आपने देखा? नियति को इस घर में आए हुए अभी कुछ ही दिन हुए हैं और घर में सभी को उसकी पसंद और नापसंद का भी पता लग गया। आज उसके जन्मदिन पर सबने उसे उसके पसंद की चीज़े दी, यहां तक की खाना भी आज सारा उसकी पसंद का बना है, नहीं, मतलब मैं यह नहीं कह रही कि ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन मैं तो कब से इस घर में हूं, पर शायद ही आपके अलावा इस घर में किसी को मेरी पसंद ना पसंद का पता भी होगा, जबकि मैं अपने से आगे ही सबको रखती हूं, फिर ना जाने मुझमें क्या कमी है? आकांक्षा ने अपने पति स्वयं से कहा

स्वयं: कमी तो है तुममे हैं, जो शायद आज तक तुमने भी कभी नहीं देखा

आकांक्षा: कौन सी कमी? जो आपको भी नज़र आ गई, पर सिर्फ मैं ही नहीं देख पाई? आकांक्षा ने रुआंसी होकर कहा

स्वयं: देखो, तुमने कभी अपने आप को इतना महत्व ही नहीं दिया, जितना की नियति ने अपनी पहली रसोई में ही बता दिया, अब जब हम खुद को ही महत्व नहीं देंगे तो भला और लोगों से उम्मीद किस बात की?

आकांक्षा: यह आप क्या बोल रहे हो? ज़रा विस्तार में बताएंगे? ना तो मेरा अभी पहेली सुनने और ना ही बुझने का इरादा है और नियती ने ऐसा भी क्या बता दिया था अपनी पहली रसोई में?

स्वयं: जब नियति ने अपनी पहली रसोई के दिन सबको अपने हाथों से बनाई हुई खीर परोसी थी, तो सब ने उसे नेग दिया, सिवाय अहम के, जब सब ने अहम से कहा कि उसका नेग कहां है? तो अहम ने कहां के मुंह दिखाई में तो नेग दे ही चुका हूं और कितनी बार दूंगा? जिस पर नियति ने तुरंत कहा कि, वह मुंह दिखाई का नेग था और आज बात पहली रसोई की हो रही है, दोनों में काफी अंतर है, मुझे अपने काम में तब मज़ा आता है, जब उसकी सरहाना की जाती है और ना तो आप मुझे रोज़ नेग देंगे और ना ही रोज़ मेरी पहली रसोई होगी, तो फिर आज बिना नेग बात तो नहीं बनेगी, उसके बाद भले ही नियति ने इस बात को हंसकर टालना चाहा, पर उसने सीधे तरीके से ना कह कर घूमाकर सबको यह समझा ज़रूर दिया कि जो उसको अगर कोई यूं ही टालना चाहेगा तो इसे वह स्वीकार नहीं करेगी, पर ज़रा सोचो उसकी जगह अगर तुम वहां रहती तो तुम क्या कहती? तुम कहती जाने दीजिए मैं यह खीर किसी नेग के लिए नहीं बनाया, बस आप लोगों को अच्छा लगा यही मेरा नेग होगा, देखो आकांक्षा मैं जानता हूं तुम सच में नेग के लिए नहीं, सबके लिए दिल से करती हो, पर हर वक्त दिल से नहीं दिमाग से भी काम लेना पड़ता है, तुमने शुरूआत से ही सबको सबके दिल में यह एहसास जगा दिया है कि तुम सबके लिए हमेशा तैयार हो, चाहे कोई तुम्हारी बड़ाई करें या बुराई? और अब उसी का परिणाम देख रही हो, मैं चाहता तो तुम्हें यह सब कुछ पहले भी बता सकता था, पर तुम्हारे अंदर से जब तक कोई सवाल ही नहीं आता, तो तुम इस विषय को भी अनदेखा कर देती

आकांक्षा: फिर? अब मैं ऐसी ही हूं तो क्या करूं? मैं नहीं कर सकती दिखावा! अरे अपने ही परिवार के लिए अगर कुछ करो तो वह गिनवाना पड़ेगा? उसकी शाबाशी लेनी पड़ेगी? सुनकर ही अजीब लग रहा है

स्वयं: तो फिर जिस तरह से अपने अकल पर ताला लगा लिया है, तो अपनी जुबान और आंखें भी उसी तरह बंद कर लो। फिर यह शिकायत क्यों? देखो आकांक्षा मैं नहीं कहता, तुम हर बात पर जताओ की तुम्हारी अहमियत क्या है? पर जब किसी काम की सरहाना हो रही हो तो उसे ले भी लिया करो, बजाय यह कहने के यह तो मेरा काम है, कभी नाज़ायज बातों पर अपनी टिप्पणी भी दे दिया करो, हमेशा सरल बनने से अच्छा है कभी-कभी कठोर कदम भी उठा लिया करो, इतना करने पर भी कभी-कभी तुम्हारे ऊपर मां कितना चिल्लाती है, ना तुम खुद कुछ कहती हो और ना मुझे ही कुछ कहने देती हो, इससे तुम्हें क्या लगता है सामने वाला चुप हो जाएगा? नहीं वह तुम पर और भी हावी हो जाएगा, मैं तुम्हें क्लेश करने के लिए नहीं कह रहा, पर सही को सही और गलत को गलत तो कह सकती हो ना?

आकांक्षा: अच्छा फिर अब आप ही बताओ मैं क्या करूं?

स्वयं: यह अब तुम ही सोचो कि तुम्हें क्या करना है? तुमने ही सबको बिगाड़ा है और अब तुम्हें ही सबको सुधारना भी है

अगले दिन काफी तेज़ बारिश हो रही थी, कि कोई भी दफ्तर नहीं जा पाया, तो अहम, स्वयं उनकी मां (शोभा जी) पिता (रामेश्वर जी) बहन (अदिति) और भाई (सत्यम) सभी ने कहा आज ऐसे मौसम में सुबह चाय के साथ ब्रेड पकोड़े नाश्ते में हो जाए तो मज़ा ही आ जाएगा

शोभा जी: हां यह बढ़िया है और आकांक्षा तो फटाफट बना लेगी, क्यों आकांक्षा?

आकांक्षा: नहीं मम्मी! आज मैं नहीं बना सकती, कल रात से मेरी गर्दन पर मोच है, मैं बस नियति की थोड़ी बहुत मदद कर पाऊंगी।

अहम: हां हां नियती तुम ही बना लो, ब्रेड को बेसन में लपेटकर चलना ही तो है, कितना ही समय लगेगा?

नियित घबरा जाती है, इतने पकोड़े अकेले कैसे बनाएगी? पर कर भी क्या सकती थी? वह रसोई में जाकर तैयारी करने लगी और इधर आकांक्षा गर्दन दर्द का बहाना लेकर रसोई से निकल गई, नियति काफी देर तक तैयारी करती रही, फिर बाहर से एकाएक आवाज़े आने लगी के दोपहर को मिलेगा क्या नाश्ता? अच्छा है दोनों खाना साथ में ही निपट जाएगा, फिर नियति जब पकौड़े तल कर लाती है, सब बस नुक्स निकालने में लग जाते हैं, कोई कहता अंदर से कच्चे हैं, कोई कहता मिर्च बड़ी तेज़ है और हर कोई फिर आकांक्षा से नियति की तुलना करने लगा, के उसका हाथ तो बिल्कुल नापा तोला है, अलग ही स्वाद है, जिस पर नियति भड़क जाती है और कहती है एक तो इतनी देर से अकेले सारा कुछ किया, आपको मेरी मेहनत नहीं दिखती, यह तो बिल्कुल भी अच्छी बात नहीं है

शोभा जी: अरे नियति! नाराज क्यों होती हो? आज तक तो यह सब आकांक्षा ने भी अकेले ही किया? कभी कम ज्यादा होने पर हमारी बातें भी सुनी, पर कभी वह ऐसे नहीं बोली और तुम आज एक दिन में ही गुस्सा हो गई? यह भी तो सही नहीं

नियति: हां तो अब दीदी गाय बनकर रहेगी तो क्या मैं भी वही करूं? मैं दीदी नहीं हूं मुझे नहीं बना महान

शोभा जी: महान नहीं, आकांक्षा हमारे घर की शान है, हां वह बात अलग है हमने कभी उसे उतना महत्व नहीं दिया, जितना देना चाहिए, पर फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं कि उस बेचारी ने आकांक्षा: तुम्हें भी तो कभी ना कभी यह सब खटका तो होगा?

शोभा जी के इस बात से स्वयं समेत सभी सोच रहे थे की आकांक्षा कहेगी, नहीं मम्मी यह सब अपनों में नहीं होता है, पर यहां सभी के सोच के विपरीत आकांक्षा कहती है, हां मम्मी, खटका तो बहुत था, जब नियति के जन्मदिन पर उसे इतना खास महसूस कराया गया और मेरा जन्मदिन किसी को याद तक नहीं रहता, उसकी सारी पसंद की चीज़े हुई पर मेरी पसंद किसी को पता ही नहीं, पर आज एक बात अच्छे से समझ आ गया है कि जब तक हम खुद को ही महत्व नहीं देंगे, कोई हमें महत्व नहीं देगा, मम्मी अब से मैं ही खुद को खास महसूस करवाऊंगी, ताकि किसी को मुझे ठेस पहुंचाने का मौका ही ना मिले

दोस्तों, हम औरतें बचपन से ही त्याग की मूर्ति बन जाती है, क्योंकि हमें यही सिखाया जाता है कि सबको खुश रखो, बदले में भले ही खुद को भूल जाओ, दूसरों से उम्मीद बाद में करना पहले खुद को अपनी ही उम्मीद पर खड़ा उतरवाओ, एक ऐसा कठोर कदम उठाओ जिससे तुम्हारी खुशियों की चाबी सिर्फ तुम्हारे ही हाथों में हो, क्यों सही कहा ना मैंने..?

धन्यवाद

रोनिता

#कठोर कदम



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